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रविवार, 23 दिसंबर 2012

"डायरी-29"

आज मैंने चाँद को समझने की कोशिश की। ये खींचता है। ये वही चाँद है जिसे मैंने बचपन से देखा है। अपने देश के आकाश में भी देखा है। लेकिन मैं छोटा हूँ, इसलिए मैंने इसे केवल देखा। अभी पंद्रह साल ही तो पूरे हुए हैं मेरे।
एक बात बताऊँ? भारत में वो उम्र सुनहरी मानी जाती है, जिसमें पिछले दिनों मैं पड़ गया। इसलिए मैंने ये गुस्ताखी कर डाली। सब कुछ देख कर छत से एक बार नीचे उतर आने के बाद, मैं एक बार सबकी नज़र बचा कर फिर से छत पर चला गया। किसी को मालूम नहीं पड़ा, करण को भी नहीं।
ताज कल ही दिखेगा।कुछ देर पहले जब गाइड ने बताया था कि  वह 'उस' दिशा में है, तब वहां हलके से रुपहले बादल थे, इसलिए कुछ नहीं दिखा।
बादल अब भी हैं। ये बरसने वाले बादल नहीं हैं, ये केवल ताज पर कुदरत का एक झीना पर्दा है। इसने ताज को तो छिपा लिया, लेकिन यहाँ की हवा को कमान पर चढ़ा दिया।अब मैं उतना छोटा भी नहीं हूँ, कि  आप मेरी बात को अनदेखा करदें।
ये एक हरियाली से ढका छोटा, लेकिन मादक शहर है। ये मत सोचिये कि  हमने मदिरा पीली है, मुझ पर तारी प्रमाद हवा के रास्ते मेरी उम्र पर आया है। अपनी झोली में ये हवा ताज की आत्मा पर वारकर कुछ हीरे लिए फिर रही है। कल अभी दूर है। मैंने कभी सोचा नहीं था कि  अपनी उम्र के सोलहवें साल में मैं दुनिया के मायावी आश्चर्य के साये में रात की धूप का सामना करूंगा, और मेरे अंगों को मंत्र अभिषिक्त करने के लिए नियति मुझे सात समंदर पार ऐसे प्रेमनगर में लाएगी।     

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपका तो गद्य भी पद्य की तरह खूबसूरत है ...

    आपके द्वारा प्रेषित पुस्तक उगती प्यास दिवंगत पानी मिली ..... हैरान हूँ कि आपको मेरा पता कैसे मिला ? और उससे ज्यादा कि आपने मुझे याद रखा ... आभार ....

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  2. Achchhe pathkon ka pataa pustaken dhoondh hi leti hain, unhe bhi to kadradaan chahiyen.

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