राजस्थान की राजधानी और गुलाबी नगरी जयपुर आज तेज़ी से बढ़ कर विश्व मानचित्र पर आने को आतुर है. ऐसा और पहले हो सकता था, लेकिन आज़ादी के बाद पहले पैतीस-चालीस साल जयपुर ने अपने पैरों पर आप कुल्हाड़ी मारी.यह स्वतंत्र और जनसंघ जैसी पार्टियों को वोट देकर अपना प्रतिनिधि विधानसभा में भेजता रहा, और सरकार कांग्रेस की बनती रही.अतः स्वतंत्र पार्टी की राजमाता गायत्री देवी और जनसंघ के भैरों सिंह शेखावत व सतीश चन्द्र अग्रवाल जैसे कद्दावर और जुझारू नेताओं की सारी शक्ति तत्कालीन सरकारों से विरोध-मतभेद रखने में खर्च होती रही, और बदले में जयपुर एक अदद बड़ी रेलवे लाइन को भी तरसता रहा. इस रस्साकशी में जयपुर अन्य राज्यों की राजधानियों से काफी पिछड़ गया. बदलते समय के साथ राज्य और केंद्र में एकसाथ बीजेपी भी आई और इसी तरह कांग्रेस भी आई. नतीजा यह हुआ कि जयपुर ने विकास की राह पकड़ ली. आज जयपुर ठीक वैसे ही पनप रहा है जैसे एशियाड के समय कभी दिल्ली पनपा था.आज जयपुर की शान केवल आमेर, सिटी-पैलेस, जंतर-मंतर,म्यूजियम, रामनिवास बाग़ ही नहीं हैं बल्कि वर्ड ट्रेड पार्क,दर्ज़नों अत्याधुनिक मॉल ,और बीसियों पांच सितारा होटल भी हैं.देश के हर बड़े शहर से जयपुर सीधी गाड़ियों से ही नहीं, हवाई मार्ग से भी जुड़ा है.अंतर-राष्ट्रीय विमानतल जयपुर की शान है. विदेशी पर्यटक यहाँ अब ऐसे घूमते देखे जाते हैं, मानो वे अपने देश में ही घूम रहे हों. शानदार विधान-सभा भवन मौजूद है, लेकिन उसमे बैठ कर कौन क्या करता है, ये तो राम ही जाने.
मेरे बारे में

- Prabodh Kumar Govil
- I am a freelancer running 'Rahi Sahyog Sansthan', an NGO working towards the employment of rural youth in India
गुरुवार, 19 मई 2011
बुधवार, 18 मई 2011
बुरा भी अच्छे के लिए हुआ अजमेर में
राजस्थान में जब गुर्जरों का आरक्षण के लिए आक्रामक आन्दोलन चला,तो मीणा बहुल क्षेत्रों में मीणा समुदाय के लोग भी इसके प्रति मानसिक लामबंदी की तैयारी करने लगे. क्योंकि गुर्जरों द्वारा आरक्षण मांगने में उनकी थाली के घी की ओर ही अंगुली उठाई जा रही थी.नतीजा यह हुआ कि दूरदर्शी सचिन पायलेट ने अपनी ज़मीन का भू-डोल समयपूर्व ही भांप लिया,और वे अजमेर से सांसद बने.पायलेट केंद्र में मंत्री बने तो अजमेर की पिछले कुछ समय से अवरुद्ध पाइप-लाइनें भी खुलीं. आज अजमेर फिर कई बातों को लेकर सुर्ख़ियों में है.
वैसे अजमेर शहर कभी पर्यटन,पानी और पढ़ाई को लेकर राजस्थान का सिरमौर रहा है. सुप्रसिद्ध ख्वाजा की दरगाह बड़ी संख्या में जियारत करने वालों को यहाँ खींचती रही है.अजमेर सुन्दर भी है, साफ भी. पर्यटन की द्रष्टि से यहाँ आनासागर, फाईसागर, ढाई-दिन का झोंपड़ा और जैन मंदिर जैसे अनेकों दर्शनीय स्थान हैं जो शहर के महत्त्व को बढाते हैं. इसे किसी समय प्रांत की शैक्षणिक नगरी का दर्ज़ा भी प्राप्त था. प्रसिद्द 'पुष्कर तीर्थ' भी अजमेर के निकट है. यहाँ ब्रह्मा-मंदिर विशेष आकर्षण है. पुष्कर की अवस्थिति कभी प्राकृतिक जल-संग्रहण से ही निर्मित हुई थी किन्तु अब यहाँ जल-संसाधन के विशेष प्रयास और प्रयोग किये गए हैं. अजमेर संभाग मुख्यालय है जो नागौर, भीलवाडा और टोंक जिलों के समावेश से प्रशासनिक इकाई बनाया गया है. स्कूली-शिक्षा का माध्यमिक शिक्षा बोर्ड इसके महत्त्व को बढाता है.
मंगलवार, 17 मई 2011
विश्वसनीय लगते हैं सीकर के युवा
बड़े शहरों में रहने वाले लोग तरह-तरह की सुविधाओं और अनुभवों के कारण धीरे-धीरे अतिचतुर हो जाते हैं, जिस से उनकी विश्वसनीयता दाव पर लग जाती है.इसी तरह ग्रामीण-क्षेत्रों में रहने वाले लोग अल्प-शिक्षित और भोले-भाले रह जाने के कारण उनकी क्षमता पर पूरा विश्वास नहीं हो पाता. इन दोनों स्थितियों के बीच की जो उचित-तम स्थिति है, वह आप सीकर के युवाओं में देख सकते हैं.
दिल्ली-जयपुर जैसे शहरों के लोगों की बातचीत और 'बोडी -लैंग्वेज' में आपको एक बनावटीपन दिखेगा.शेखावाटी की तरफ के लोग हरियाणवी माहौल की भांति आपको बहुत ही बेबाक और कहीं-कहीं अक्खड़ तरीके से बोलते दिखेंगे. इन दोनों के बीच का जो संभ्रांत- संतुलन है वह आपको सीकर के युवाओं में मिलेगा. इन कारणों से सीकर के लोग विश्वसनीय भी लगते हैं और आकर्षक भी. वैसे सीकर शहर में कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं दिखाई देता. न तो यह् पर्यटन -व्यापार-कृषि की दृष्टि से कुछ विशेष है, और न ही प्राकृतिक सौन्दर्य में. यहाँ के राजस्थानियों का कई दूसरी जगहों पर जाकर व्यापार करना या पैसा कमाना ज़रूर शहर की तकदीर लिखता रहा है. यहाँ आपको असंख्य बड़ी-बड़ी ऐसी हवेलियाँ मिलेंगी जिनके निर्माण का ही नहीं, रख-रखाव तक का खर्चा बाहर से आ रहा है. अनेक दानवीरों के चलते कई शिक्षण-संस्थाएं भी यहाँ पनपी हैं. सुप्रसिद्ध खाटू-धाम और सालासर भी इसी जिले में हैं. राजमार्गों पर तेज़ी से पनपते होटल-रिसोर्ट और अन्य केन्द्रों ने सीकर से जयपुर की दूरी को और कम कर दिया है.
सोमवार, 16 मई 2011
नाम पर मत जाइये भीलवाड़ा के
नाम पर मत जाइये, नाम में कुछ नहीं रखा. अब 'भीलों'' जैसा यहाँ कुछ नहीं दीखता. भील तो उघड़े बदन रहते हैं, पर भीलवाड़ा राजस्थान में कपड़ा उद्योग का पर्याय है.भील आखेट से अपनी उदरपूर्ति करते रहे, किन्तु भीलवाड़ा के लोग शिकार करते नहीं, शिकार होते रहे, विकास और बदलाव के.
मुझे लगता है कि भीलवाड़ा में साहित्यिक माहौल व अभिरुचि भी अन्य नगरों के मुकाबले कुछ ज्यादा है. बच्चों की प्रतिष्ठित पत्रिका 'बालवाटिका' यहीं से प्रकाशित होती है. यहाँ के कुछ आयोजनों में कभी-कभी मुझे भी शामिल होने का अवसर मिला है. मैंने देखा है कि व्यापारी, शिक्षक, विद्यार्थी व अन्य पेशेवर लोग साहित्यिक गतिविधियों के लिए मुलायम कोण रखते हैं. वे चाव से इनमे शिरकत करते हैं. शायद उद्योगों के बाहुल्य से इस तरह की गतिविधियों को आर्थिक-प्रश्रय सहज उपलब्ध हो जाता हो. भीलवाड़ा में आरंभिक शिक्षा पर भी काफी बल दिया गया है. यहाँ विद्यालयों की पर्याप्त संख्या और उनमे चलते नवाचार आकर्षित करते हैं. कुल मिला कर ऐसा लगता है जैसे शहर एक 'आदर्श' रचने के लिए कसमसा रहा हो. किसी शहर की ऐसी सोच का सम्मान सरकारों को भी करना चाहिए, और उसे बेहतर साधन-सुविधाएँ उपलब्ध करवाने चाहिए. केन्द्रीय मंत्री व राजस्थान के कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष जोशीजी शायद इस भावना को भांप चुके हैं.
रविवार, 15 मई 2011
परम्पराओं और जीवन-शैली की गहरी पैठ आधुनिकता के लिए चुनौती है बूंदी में
राजस्थान के राजे-रजवाड़ों की स्मृतियाँ और शान-शौकत के चिन्ह अब भी जिन शहरों में बचे हैं, उनमे बूंदी भी है. जयपुर से कोटा जाने वाले राजमार्ग पर कोटा से थोडा पहले ही इसका मुख्यालय है. इस शहर को पहाड़ियों ने इस तरह से घेर रखा है, कि यह पहाड़ों की गोद में पत्थरों की कारीगरी का बेहतरीन नमूना है. पर्यटक इसे कोतुहल से देखते हैं. सरकार भी बूंदी महोत्सव का आयोजन करके पर्यटकों के लिए एकसाथ इसकी सभी विशेषताओं को परोसने की ज़िम्मेदारी उठाती है.पुराने ज़माने में लोग कितने मेहनत-कश रहे होंगे, और स्थापत्यकला को जीवन से जोड़ने के शिल्प में उन्हें कैसा महारत हासिल होगा, इसकी शानदार मिसाल बूंदी है. यद्यपि एक आधुनिक शहर के रूप में विकसित होने और जीवन-शैली को मौजूदा दौर का बनाने की कोशिशों में यही विशेषताएं बाधा भी बनती हैं. फिर भी माहौल अब तेज़ी से बदल रहा है.
जो राजा बदलते समय के साथ बदलने में यकीन रखते थे, उनके नगर भी आधुनिक हो गए, पर जिनकी अपने संस्कारों, परम्पराओं और जीवन-शैली पर गहरी पैठ थी, उनके नगर आज भी आधुनिकता की चुनौती से जूझ रहे हैं.बूंदी के केशोरायपाटन और लाखेरी जैसे कसबे औद्योगिक विकास में काफी आगे हैं. लाखेरी तो किसी उद्योग नगर की संस्कृति ही जी रहा है. पानी की पूरे जिले में कोई कमी नहीं है. चम्बल नदी के तट जिले को जगह-जगह से भिगोते हैं.
शनिवार, 14 मई 2011
पाली जिले का रणकपुर अद्भुत है
यदि मुझसे कोई पूछे कि राजस्थान में ऐसी कौन सी जगह है जहाँ आप शांति से अपने खुद के साथ रहते हुए कुछ दिन बिताना चाहेंगे, तो मेरा जवाब होगा पाली जिले के रणकपुर में. न जाने क्यों , यह पूरा क्षेत्र ऐसा लगता है जैसे हम उस काल में पहुँच गए हों जब समाज और देश में सचमुच धर्म और आध्यात्म का बोलबाला था. जब कलाकार ईश्वर को बनाया करते थे,संगीतकार ईश्वर को गाया करते थे, और व्यापारी ईश्वर को हाज़िर-नाजिर जान कर व्यापार किया करते थे. राजा तब ईश्वर से केवल वोट दिलवाने का रिश्ता ही नहीं रखते थे, बल्कि उसमे आस्था भी रखते थे.
पाली जिला वैसे तो जोधपुर के निकट बाद में बना जिला है, पर यह मेवाड़ और मारवाड़ के बीच प्राकृतिक विभाजन भी है. यदि आप उदयपुर से चारभुजा-देसुरी होते हुए पाली जिले में प्रवेश करें तो आपको अपरिमित प्राकृतिक सौन्दर्य के भी दर्शन होते हैं. इसी हरे-भरे माहौल के बीच अनेकों मंदिर-मठ जगह-जगह आपका ध्यान खींचते हैं.
पाली में व्यापारी और पैसा बहुत है. इसी के चलते लोगों में एक सहिष्णुता और संतृप्ति के दर्शन होते हैं. यहाँ के लोग बोली से शांत और स्वकेंद्रित लगते हैं. समीपवर्ती जोधपुर शहर का तेज़ी से हुआ विकास यहाँ भी लहराता है. स्थान-स्थान पर अच्छे होटल और विश्रामगृह भी आपको मिलेंगे क्योंकि जयपुर से अहमदाबाद की ओर जाने वाला यातायात यहाँ से काफी गुज़रता है.
चित्तौडगढ़ ने टूटने न दिया कभी शीशे का बदन या बदन का शीशा
मानव सभ्यता के दो कोण देखिये. एक ओर तीस वर्ष का युवक पिच्चासी वर्ष के वृद्ध के लिए कहता है कि यह मेरा पिता है, और तथाकथित पिता इस से इंकार करता है. विवश होकर सरकार को वृद्ध के शरीर का जैविक परीक्षण कराना पड़ता है.दूसरी ओर एक राजकुमारी को विवाह प्रस्ताव के साथ एक युवक देखना चाहता है, और इसके लिए लाजवंती राजकन्या को सीधे युवक को न दिखा कर एक इमारत में शीशे के सामने खड़ा किया जाता है, जहाँ वह दूसरी इमारत की पानी में उतरती सीढ़ियों पर खड़ी कन्या का अक्स शीशे में दूर से देख पाता है.इतना ही नहीं, बल्कि खिड़की के छज्जे पर एक सैनिक नंगी तलवार लेकर बैठाया जाता है, ताकि युवक गलती से भी झांक कर कहीं राजकन्या को सीधे न देख ले.
इन दोनों घटनाओं में शताब्दियों का समय अंतराल है. लेकिन इस से कोई फर्क नहीं पड़ता, चित्तौड़ को आज भी अपने इतिहास में दर्ज इस दर्प-दीप्त कथानक पर फख्र है. वहां के किले में यह आख्यान आज भी जीवंत है, और देशी-विदेशी सैलानियों को हैरत में डालता है. इसी शहर में विजय का सर्वकालिक, सार्वभौमिक 'विजय-स्तम्भ' भी स्थित है. चित्तौड़ की कीर्ति की यही इतिश्री नहीं है, इसका नाम राजकन्या मीरा से भी जुड़ा है,जिसने एक पत्थर के टुकड़े से तराश कर बनाई गयी मूर्ती को अपने तमाम रिश्तों से ऊपर प्रतिष्ठापित कर दिया, और दीवानगी की तमाम हदें पार कर लीं. आज चित्तौड़ तेज़ी से औद्योगिक विकास की दौड़ में शामिल एक शहर है, जिसकी फितरत से राजस्थानी आन-बाण और शान अब भी टपकती है.
गुरुवार, 12 मई 2011
हाशिये का अकेलापन बारां ने भी झेला है
मध्यप्रदेश और राजस्थान की सीमा पर है एक और आदिवासीबहुल जिला बारां. जब हम राजस्थान के पिछड़े जिलों की बात करते हैं, तो हमें बारां का नाम भी लेना पड़ता है. ऐसा हम ही नहीं कहते, बल्कि सरकार खुद भी कहती है. सरकार ने पिछड़े जिलों के विकास के लिए जो विशेष फंड की व्यवस्था की है, उसके हितग्राहियों में बारां भी है. बारां शहर में आपको एक विचित्रता और भी दिखती है. यह मूल रूप से तो छोटा सा फैला-फैला मामूली शहर है, पर बाद में जिला मुख्यालय बनने और विकास की सूची में आने से यहाँ सरकारी इमारतें नई और बड़ी-बड़ी बन रही हैं.इस से यह भी नए-पुराने शहर में बँट गया है.फिर भी उन्नति को लेकर यहाँ के रहवासियों में एक भोला उत्साह है. यही उत्साह यह भी बताता है कि इन लोगों में सामूहिकता की भावना विशेष है, वरना अब बड़े शहरों में अपने शहर से लगाव भला कितनों को रह गया है? कुछ समय पूर्व जब इसका निकटवर्ती जिला झालावाड सुर्ख़ियों में आया था तो फ्लड लाइट इस पर भी पड़ी.नतीजतन कोटा के साथ मिल कर एक सुनहरा त्रिकोण यहाँ भी बन गया जो चौड़ी शानदार सड़क और काली-सिंध नदी के आकर्षक नज़ारे में बदल गया. जिस पर आदमी मेहरबान नहीं होता, उस पर कुदरत ज्यादा मेहरबान होती है. राजस्थान के कई नामी-गिरामी जिले इस रूप में बारां से ईर्ष्या कर सकते हैं कि यहाँ हरियाली की छटा बेहद आकर्षक है. वन-प्रांतर में अरण्य-जीवों की संभावना भी बलवती है.
बुधवार, 11 मई 2011
राज- बत्तीसी और अकल- दाढ़ माने प्रतापगढ़
मैं अपनी यात्रा में जब उदयपुर से चित्तौड़ की ओर आ रहा था बीच में निम्बाहेडा और छोटी व बड़ी सादड़ी पड़े.यह इलाका सीमेंट के उत्पादन के लिए जाना जाता है. यहीं वह महत्वपूर्ण खबर भी मिली कि राजस्थान का जो नया जिला बन रहा है वह इस इलाके से लगता हुआ ही है.मैं प्रतापगढ़ को देखने का लोभ छोड़ नहीं सका. जिले की तब-तक केवल घोषणा ही हुई थी, मुख्यालय के दफ्तरों ने काम करना शुरू नहीं किया था. मेरी दिलचस्पी यह जानने में थी कि चित्तौड़ के कुछ हिस्से को निकाल कर यह जिला किस आधार पर बनाया जा रहा है? मेरी जानकारी के अनुसार उस समय लगभग नौ शहर जिला बनने की दावेदारी में थे.मैंने वहां कई लोगों से बात की. छोटे-बड़े, ग्रामीण-शहरी, व्यापारी-कर्मचारी कई लोगों से मैं मिला. बाद में अपने अवलोकन की पुष्टि के लिए मैं राजस्थान पत्रिका अखबार के कार्यालय में भी गया. मुझे इस शहर के जिला बनने के प्रमुख रूप से दो कारण दिखाई दिए. एक कारण तो यह, कि दक्षिणी राजस्थान की लम्बी-चौड़ी आदिवासी बेल्ट का संतुलित विकास करने की द्रष्टि से उदयपुर संभाग का कुछ हिस्सा चिन्हित करना ज़रूरी समझा गया , ताकि इसका त्वरित विकास हो सके. इस हिस्से की अब उदयपुर संभाग काफी घना हो जाने के कारण अनदेखी हो रही थी. दूसरे, इस इलाके के बहुत सारे लोग विदेशों में थे और छोटे-छोटे गाँव-ढाणी तक में विदेशी पैसा खूब आ रहा था. इस तथ्य को जिले की अर्थ-व्यवस्था के पक्ष में माना गया. और इस तरह यह जिला बन गया. मुझे लगा, सर्कार ने यह निर्णय राजनैतिक सोच से नहीं लिया, बल्कि समझ-बूझ कर अकल से लिया है. बस, इस राज-बत्तीसी में अकल-दाढ़ आ गयी.
मंगलवार, 10 मई 2011
होने लगेगा कभी तो करौली भी विकसित
करौली छोटा सा शहर है, लेकिन मुझे इस से एक विचित्र सा लगाव है. इसका कारण भी आपको बताता हूँ. जब मैं बहुत ही छोटा था, तो मुझे एक 'टेलेंट-खोज' परीक्षा के लिए परीक्षा-केंद्र के रूप में करौली ही मिला था. मेरे पिता ने अपनी व्यस्तता के चलते एक अन्य सज्जन के साथ मुझे परीक्षा देने भेजा था. परीक्षा के दौरान वहां के अध्यापकों ने मेरा बहुत ही ध्यान रखा. मेरे मन में तभी से इस शहर के लिए एक आकर्षण हो गया. लौटते समय हम आखिरी बस चूक गए थे, और हमें वाहन बदल-बदल कर वापस आना पड़ा, पर इस से करौली के प्रति लगाव कम क्यों होता? हाँ, अब जब बरसों बाद मैंने करौली को दोबारा देखा, तो मुझे थोडा सा दुःख ज़रूर हुआ, क्योंकि करौली अभी भी ज्यादा विकसित नहीं है. लेकिन विकास की संभावनाएं धूमिल नहीं हुई हैं. मेरे एक मित्र को यहाँ पर विश्व-विद्यालय खोलने की अनुज्ञा मिली है और मैंने देखा, शहर के एक किनारे पर उन्हें मिली ज़मीन में तेज़ी से इमारतें बनने का सिलसिला शुरू हो चुका है. यहाँ की मिट्टी हलकी सी लाली लिए हुए है,और अभी बड़े शहरों की मिट्टी की तरह गन्दी नहीं हुई है. उसमे से ख़ुशबू आती है.यहाँ के पत्थरों में भी लाली है. जब विकास होगा तो इन खूबसूरत प्राकृतिक पत्थरों को खोद-खोद कर शानदार इमारतें बन सकेंगी. मैं करौली में घूमते हुए वहाँ की गलियों में उन बच्चों को ढूंढता रहा, जिन्होंने मेरे साथ वर्षों पहले वहाँ परीक्षा दी होगी. लेकिन अब वे दिखाई थोड़े ही देते, अब तो वे अपने बच्चों के बच्चों की परीक्षा की चिंता में घूम रहे होंगे. सरकार ने यहाँ की सड़कें खूब चौड़ी बना दी हैं. शहर से कुछ दूरी पर कैला देवी का भव्य मंदिर है, जहाँ अच्छी चहल-पहल रहती है.
सोमवार, 9 मई 2011
धौलपुर, जिसके शफ्फाक- सफ़ेद नाम पर दस्युओं ने छींटे लगा दिए
जिस तरह मध्य प्रदेश के भिंड-मुरैना के नाम पर समाज-कंटकों ने दाग लगा दिए, वैसे ही राजस्थान के धौलपुर पर भी बदनामी का साया पड़ा. कुछ लोग सामाजिक जीवन से छिटक कर असामाजिक हो जाते हैं, और उन्ही की गतिविधियाँ उनके गाँव-शहर के नाम पर भी अपना असर दिखा कर रहती हैं. धौलपुर की छवि भी एक समय ऐसी ही बन गयी थी, जिसके चलते यहाँ के निवासियों की बोली में एक आक्रामकता आज भी सुनाई देती है. यूं तो यह धवलपुर है, अर्थात श्वेत शहर. डाकुओं को जीवन में बहुत कम लोगों ने देखा होता है, पर उनके किस्से-कहानियां सब सुनते हैं. ऐसे ही अनेकों प्रसंग धौलपुर से भी जुड़े हैं. धौलपुर एक ऐतिहासिक शहर है. यहाँ के कई स्थानों पर मुग़ल-कालीन नगरों की झलक मिलती है. तेज़ धूप के इस शहर में मुग़ल-स्थापत्य भी देखा जा सकता है.यहाँ आसमान जितना साफ दिखाई देता है , धूप की तल्खी भी उसी मिजाज़ की है. यहाँ की संस्कृति मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और राजस्थान, तीनों की मिश्रित संस्कृति है, जो भाषा से लेकर खान-पान और व्यवहार तक में देखी जा सकती है.यहाँ पत्थर बहुतायत में होता है. बड़ी-बड़ी शिलाओं का इस्तेमाल गाँव तक के मकानों में होता है. पथरीली भूमि पर पत्थर की पतली कटी हुई लम्बी-लम्बी पट्टियाँ यहाँ खड़े आकार में आसानी से लगाई जाती हैं. इनका भार भी दीवारें और नीव आसानी से इसलिए सह लेती हैं, कि ज़मीन सख्त है. पहली बार वहां गए सैलानियों को तो ऐसा लगता रहता है कि यह पट्टियाँ कहीं दीवारों से निकल कर गिर न पड़ें. यहाँ सैनिक स्कूल होने से देश को सैनिक प्रदान करने का श्रेय भी इस नगर को है. आखेट-युगीन प्रवृत्तियां यहाँ की मानसिकता में आज भी रची-बसी हैं.
रविवार, 8 मई 2011
एक शहर, बजता है नाम जिसका- झुंझुनू
यदि सब घर के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही जगह रहते चले आते हैं तो उनका काम मौन से भी चल जाता है और परदे की ओट से खांस-खखार कर भी. लेकिन यदि पत्नी गाँव में रहे और पति रोज़ी कमाने की खातिर परदेस में , तो फिर काम खांस-खखार कर नहीं चल पाता. तब तो एक-दूसरे को पातियाँ भी भेजनी पड़ती हैं और बोल-बोल कर फोन भी घनघनाने पड़ते हैं. इस सब से और कुछ हो न हो सब लिख-पढ़ ज़रूर जाते हैं. यही कारण है की झुंझुनू खूब पढ़े-लिखों का ही नहीं , बल्कि शिक्षा का अच्छा -ख़ासा केंद्र ही बन गया. शेखावाटी के बहुत से लोग बरसों से रोज़ी-रोटी और व्यापार के लिए दूर-दराज़ में आते-जाते जो रहे. इस जिले के हर भाग में शिक्षण-संस्थाओं की भरमार है. पिलानी का नाम तो दुनिया भर में जाना-पहचाना है.यहाँ के कालेज और स्कूलों ने तो राजस्थान में बरसों से शिक्षा की गुणवत्ता का अलख जगा रखा है. खास बात यह है , यहाँ सरकारी प्रयासों से नहीं बल्कि निजी कोशिशों से बड़े-बड़े संस्थान बने हैं. बिरला बंधुओं ने एक मिसाल कायम की है, सबसे पहले, जिसे बाद में कई दानवीरों ने दोहराया है. झुंझुनू क्षेत्र की बोली में थोड़ी सी हरियाणवी और कौरवी की झलक मिलती है. बरसों पहले जिस 'सती प्रथा' का उन्मूलन समाज सुधारकों ने कर दिया था, उसकी याद दिलाने वाला 'रानी सती का मंदिर' भी यहीं है.राजस्थानी संस्कृति को चारों दिशाओं में फ़ैलाने का काम भी यहाँ के लोगों ने खूब किया है.यहाँ के हृष्ट-पुष्ट लोग खेलों में भी देश की शान रहे हैं.
मिट्टी के घरोंदे ही नहीं शहर भी बनते हैं, बीकानेर से
पाकिस्तान की सीमा से लगे शहरों में शुमार है रसगुल्लों का शहर भी. यह भी एक आश्चर्य ही है कि विश्व भर में खाई जाने वाली यहाँ की भुजिया इस रेगिस्तानी शहर में जन्म लेकर भी किरकिरी नहीं, कुरकुरी होती है. राजस्थान का पापड -पोल भी यही है.कड़कना तो जैसे इस शहर का स्वभाव ही है.जाड़े में यह रहवासियों को कंपकपा भी देता है. जब आप बीकानेर शहर के नजदीक आने लगते हैं तो आपको दर्शन होते हैं प्रसिद्द करणी माता मंदिर के. इस मंदिर को कुछ लोग भगवान गणेश का गैरेज भी कहते हैं.चौंकिए मत,इस मंदिर के अहाते में आपको लाखों की तादाद में चूहे दिखाई देते है. और चूहे गणेश का वाहन हैं, तो यह गणेश का गैरेज हुआ कि नहीं? बीकानेर शहर ऐतिहासिक तो है ही, यह सुन्दर भी है. यह काफी खुला-खुला दीखता है. अब बाज़ारों की चहल-पहल कम नहीं रही है, फिर भी इसमें पारंपरिक शहरों की झलक बरकरार है. यह शहर काफी विनम्र है. अब यदि आप इसका कोई सबूत मांगें तो आप खुद ही देख सकते हैं कि यदि आप इसके चारों ओर घूमें तो आपको सैंकड़ों की संख्या में ऐसे गाँव मिलेंगे जिनके नाम में 'सर' आता है.आप खुद ही बताइये, जो नगर अपने गाँवों को सर कह कर बोलता हो, वह विनम्र हुआ कि नहीं?बाकी सारे राज्य में तो बेचारे गाँव शहरों को सर-सर कह कर पुकारते हैं. बीकानेर हमेशा से ही मुझे एक ज़िम्मेदार शहर लगता है. यहाँ के लोग जो कहते हैं उस पर कायम भी रहते हैं. आप को एक निष्ठां इन लोगों में ज़रूर मिलेगी.
शनिवार, 7 मई 2011
बर्फखाना और भट्टी, दोनों का नसीब पाया है चूरू ने
मैं उन दिनों वनस्थली रहता था, जिसके रेलवे-स्टेशन का नाम 'बनस्थली-निवाई' है. एक बार चूरू में एक प्रेस-कांफ्रेंस के दौरान एक स्थानीय पत्रकार ने मुझसे पूछा कि आप जहाँ से आये हैं , उस जगह का नाम हिंदी में वनस्थली और अंग्रेजी में बनस्थली क्यों लिखा जाता है. मैंने उन्हें उत्तर दिया कि बनस्थली और निवाई शहर का स्टेशन कॉमन है, यदि 'बी' की जगह 'वी' लिखा जाता तो क्रमानुसार पहले निवाई का नाम लिखा जाता. पत्रकार महोदय ने कहा- इसका मतलब नाम भी उपयोगिता देख कर रखे जाते हैं. लेकिन चूरू में हमें यह जानकारी नहीं मिल सकी कि इस नाम का अर्थ क्या है और यह क्यों पड़ा होगा? पर इस रेतीले जिले की महिमा देख कर कहना पड़ता है कि नाम में क्या रखा है? सर्दी के मौसम में यह हिल-स्टेशनों को भी मात देने वाला मैदानी शहर बन जाता है. यहाँ मिट्टी में पानी के बर्फ़ की तरह जम जाने की ख़बरें आती हैं. गर्मी में यही रेत-कण चिंगारी बन जाते हैं. वर्षा वैसे तो होती ही कम है, पर जो होती है वो भी रेत में ऐसे गिरती है जैसे गरम तवे पर पानी की बूँद. यहाँ आंधियां ज़रूर मौलिक और रंगीन चलती हैं. गर्द के गुबार ऐसे उड़ते हैं मानो अभी-अभी शिव का तांडव हो कर चुका हो. नजदीक का छोटा और शैक्षणिक शहर,जिसका नाम सरदार शहर है , इस जिले का 'थिंक-टैंक' है .मुझे चूरू के आस-पास घूमते हुए हमेशा ऐसे गावों की याद आती है जो युद्ध की पृष्ठ-भूमि वाली फिल्मों में दर्शाए जाते हैं. लेकिन शायद यह शहर 'जय जवान' से ज्यादा 'जय किसान' की मिसाल वाला है. सारा जिला रेत का समंदर सा दीखता है, जिसमे कम पानी में पनपने वाले पेड़ कहीं-कहीं द्रश्य को खूबसूरत बनाते हैं.
गुरुवार, 5 मई 2011
बाड़मेर की छाया आबू की किरणें और गुजरात का तड़का माने- जालौर
सिरोही और बाड़मेर के बीच का सैंडविच शहर है जालौर . इसकी सीमायें गुजरात से मिलती हैं. हलचल और शोरगुल से दूर , यह एक शांत सा शहर है. जहाँ सिरोही हिल-स्टेशन माउन्ट आबू के कारन देश भर की नज़रों में रहता है, जालौर में केवल वही लोग आते-जाते हैं जो जालौर आते हैं. वैसे तो यहाँ आबादी छितरी-छितरी है लेकिन गुजरात पास में होने के कारण छोटा-छोटा कारोबार करने वाले व्यापारी यहाँ अच्छी तादाद में हैं. किसी समय देश की केन्द्रीय राजनीति में अहम् स्थान रखने वाले बूटा सिंह इसी इलाके से चुनाव लड़ कर लोकसभा में पहुंचा करते थे.जालौर को पर्यटकों का रास्ता भी माना जाता है. जालौर राजनैतिक रूप से बहुत जागरूक शहर है, शायद इसका कारण यही है कि इसने काफी समय तक देश को केन्द्रीय गृहमंत्री दिया है. मुझे जालौर में ghoomte हुए एक विचित्र बात देखने को मिली कि इस जिले में जिला-मुख्यालय से ज्यादा सजगता आस-पास के ग्रामीण इलाकों में नज़र आती है. मैं आपको यहभी बतादूँ कि यह आकलन मैंने किस आधार पर किया. मुझे काफी देर तक यहाँ के जिला-अधिकारी के साथ बैठने का मौका मिला और इस बीच मैंने देखा कि उनके पास लगातार आते जाने वाले मामले इन्ही क्षेत्रों से थे और जब वे उस क्षेत्र की समस्याओं का कोई समाधान करते थे तो ज़्यादातर मिसालें गावों के मामलों की ही आती थीं.
बुधवार, 4 मई 2011
पुरुषार्थ और धीरज की मित्रता टूटने से बना हनुमानगढ़
पुरुषार्थ और धीरज मित्र नहीं होते. कभी साथ-साथ रहें भी तो जल्दी ही अलग हो जाते हैं. श्रीगंगानगर की तेज़-रफ़्तार प्रगतिकामी जिजीविषा धैर्य की मंथर प्रयत्नशीलता से अलग हुई तो राजस्थान में हनुमानगढ़ जिला बन गया. हनुमानगढ़ शहर भी दो भागों में बँटा हुआ है,एक जंक्शन के नाम से जाना जाता है दूसरा टाउन के नाम से. चूरू जिले के रतनगढ़ शहर से शैक्षणिक नगरी 'सरदारशहर' होते हुए जब राजमार्ग से हनुमानगढ़ की ओर आते हैं तो रास्ता काफी लम्बा प्रतीत होता है. लेकिन इसी रास्ते पर मंशापूर्ण हनुमान जी का एक विशाल और आधुनिक मंदिर अवस्थित है जो मुसाफिरों को मंजिल से पहले का आरामदेह पड़ाव देता है. इस लम्बी यात्रा में यह मानो सहरा का नखलिस्तान है जिसकी कोई मुसाफिर अनदेखी नहीं कर पाता. हनुमानगढ़ के लोग शैक्षणिक और सामाजिक गतिविधियों में अच्छी रूचि लेने वाले हैं. शायद यही तत्व इसके जन्म का भी एक कारक बना है. यहाँ के ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों को सुन्दर पतली मेड़ों से सीमाबद्ध किया जाता है. हरियाली और पानी की जो कमी सर्वत्र दिखाई देती है वह धीरे-धीरे यहाँ ओझल होती दिखाई देती है. हनुमानगढ़ के युवा उत्सवधर्मी होते हैं और ऐसे आयोजनों से जुड़ने को लालायित रहते हैं जिनमे उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिले.तीज-त्यौहार इस शहर में अब भी पुरातन एकाग्रता से मनाये जाते हैं. दिनचर्या में कस्बाई मानसिकता के साथ बोली में पंजाबी और हरियाणवी का पुट इस नगरी की विशेषता है.
मंगलवार, 3 मई 2011
डूंगरपुर में वहां शाम होते ही रात होने लगती है
जिस दिन हम लोग डूंगरपुर पहुंचे उसके अगले दिन दो बातें खास थीं. एक तो वहां की तत्कालीन जिला कलेक्टर महोदया को राजस्थान के प्रतिष्ठित दैनिक अखबार "दैनिक भास्कर" ने अपने व्यापक सर्वेक्षण में राज्य का सर्वश्रेष्ठ जिला कलेक्टर चुना था, दूसरे उसी दिन 'राजस्थान दिवस' के समारोह का आगाज़ हो रहा था. सुबह एक छोटे से समारोह में मैंने कलेक्टर महोदया को फूलों का गुलदस्ता भेंट कर बधाई दी, फिर उनके साथ ही राजस्थान दिवस के समारोह में भी शिरकत की. इस अवसर पर एक प्रदर्शनी का भी आयोजन था. डूंगरपुर दक्षिणी राजस्थान का एक आदिवासी बहुल जिला है जिसकी सीमायें उदयपुर और बांसवाडा से लगती हैं. यह एक कस्बानुमा छोटा सा शहर है, जो बीच में बने एक बड़े जलाशय के इर्द-गिर्द बसा है. इसकी सीधी बसावट में पुराने मंदिरों का बाहुल्य है. शहर से कुछ दूरी पर एक रमणीक स्थल पर पुरानी स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने दर्शाता एक और सुन्दर मंदिर बना है. यह बड़ी शांत जगह है. थोड़ी-थोड़ी उदास भी. ऐसा लगता है कि लम्बे समय तक उपेक्षित रहने की नाराजगी इस जगह के मन को अभी भी कड़वा किये हुए है.शहर के आस-पास खेतों और वनों की हरियाली तो है किन्तु लोग अब भी बहुत सम्रद्ध नहीं हैं. पर्यटन नगर उदयपुर की छाया इसे केवल भौगोलिक रूप में मिली है, व्यापारिक या व्यावसायिक रूप में नहीं. इसकी कुछ बस्तियां महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों से साम्य रखती हैं , जबकि यह गुजरात के निकट है. जीवन यहाँ बहुत चुप-चुप सा है, शाम होते ही रात होने लगती है. हो सकता है कि मेरी बात पूरी तरह सच न हो , लेकिन मुझे लगा कि यहाँ महिलाएं पुरुषों की तुलना में ज्यादा सजग हैं. वे अपनी बेहतरी के लिए स्वप्नदर्शी ही नहीं प्रयत्नशील भी हैं.
सोमवार, 2 मई 2011
अभी गेंद जिसके पाले में है- जोधपुर
राजस्थान की राजधानी जयपुर को कभी-कभी विचित्र चुनौती मिलती रही है. यह चुनौती है व्यक्तिगत पसंद के आधार पर प्रभावशाली लोगों का उनके अपने नगरों को जयपुर के मुकाबले खड़ा करने का प्रयास करना. यह प्रयास कब और कितना कारगर रहा, यह फ़िलहाल हमारी चर्चा का विषय नहीं है. वर्षों पहले तत्कालीन मुख्य-मंत्री सुखाडिया ने तो राजधानी ही जयपुर से उठा कर उदयपुर ले जाने का प्रयास किया था. जयपुर कुछ जिद्दी भी तो रहा. लाख सर पटकने के बावजूद भी कभी सत्ता-पक्ष के हाथ में आकर ही नहीं देता था. अब है, मगर घर की मुर्गी की तरह, जो दाल-बराबर ही होती है. लिहाज़ा जोधपुर इन दिनों खूब पनप रहा है. सूर्य-नगरी का सूरज इन दिनों परवान पर है. राज्य में जो भी कुछ नया होता है, पहले एक बार तो जोधपुर की संभावनाओं के द्वार पर दस्तक होती ही है. पर्यटन नक़्शे पर पीले-पत्थरों की इबारत लिखने वाले जोधपुर ने कई प्रतिष्ठित देशी और विदेशी बारातों की अगवानी की है. वीआइपी हनीमून चाहे जहाँ मनाएं , फेरे जोधपुर में लेना पसंद करते हैं. कहने को मावे की कचौरी अब आपको हर कहीं मिल जाएगी, पर जिसने जोधपुर की कचौरी नहीं खाई उसने कचौरी का असली स्वाद ही शायद नहीं चखा. फ़िल्मी हीरोइनों ने जिन शहरों को मशहूर किया है उनमे बीकानेर की चमेली के साथ-साथ जोधपुर की जुगनी भी है. इस शहर में घूमना एक मज़बूत अनुभव है. साफ-सुथरा प्यारा सा शहर.
रविवार, 1 मई 2011
उजले मन के सांवले लोग
बांसवाडा के एक विद्यालय में खड़े-खड़े शिक्षकों से विमर्श करते हुए जब एक व्यक्ति ने मुझे बताया कि इस पिछड़े क्षेत्र का विकास करना कोई बाएं हाथ का खेल नहीं था, तब मेरा ध्यान सहज ही इस बात पर चला गया कि बांसवाडा क्षेत्र ने राज्य को हरिदेव जोशी के रूप में एक बार मुख्यमंत्री दिया था, जिनका एक हाथ वास्तव में ही नहीं था. शायद शिक्षक महोदय का कटाक्ष इसी ओर था.लेकिन इस कटाक्ष की आज कोई गुंजाईश नहीं है. उदयपुर से बहुत हरे-भरे जंगलों , घुमावदार रास्तों और पथरीले टीले-पर्वतों के बीच से गुज़रते हुए जब आप बांसवाडा में दाखिल होते हैं, तो आपको सहज अनुमान नहीं होता कि यहाँ के आदिवासियों का जीवन कभी कितना कष्टकर रहा होगा. प्रगति की धूप तो दूर की बात है, विकास की हवा तक यहाँ काफी मंद चाल से चली. बांसवाडा शहर में दाखिल होते समय दिन लगभग हमने पूरा खर्च कर दिया था. अच्छी-खासी शाम हो गयी थी. शहर के बाहरी इलाके में मुझे एक शानदार होटल 'रिलेक्स-इन' दिखाई दिया. मैं उसी में ठहर गया. भीतर तो दूर-दूर तक कहीं इस बात का अहसास नहीं था कि मैं कभी भीलों और आदिवासियों का क्षेत्र कहे जाने वाले बांसवाडा में हूँ. यहाँ के लोगों को यदि आप ध्यान से देखें तो आप पाएंगे कि ये दुबले-पतले मगर मज़बूत लोग हैं. और थोड़े सांवले होने पर भी इनके मन बेहद उजले हैं.यदि कभी आपके मन में आये कि इसका नाम बांसवाडा क्यों पड़ा, तो आपकी हैरानी ख़त्म करने के लिए आपको यहाँ बांस के जंगल भी दिख जायेंगे.
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